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Tuesday, April 10, 2018

कैक्टस के मोह में बिंधा एकमन भाग -55(महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला)


हमारे उन महान डायरेक्टर साहब की बात करते करते मैं बहोत आगे बढ़ गया जिनके  लिए मैं मिस्टर मोदी था. बड़ी मशक्क़त के बाद मिस्टर मोदी से मोदी जी हुआ और फिर मोदी जी से न जाने कितने पापड बेलकर महेंद्र हुआ . हर इंसान इस दुनिया में अलग अलग फितरत लेकर आया है. डायरेक्टर साहब  शायद इसी फितरत के साथ इस दुनिया में आये थे कि वक़्त के साथ फ़ौरन अपने आपको, अपने बर्ताव को बदल लिया जाए. खैर उन्हें उनकी फितरत उन्हें मुबारक, लेकिन हमने पिछले एपिसोड में जहां बात ख़त्म की थी, अगर हम लोग वहाँ से आगे बढ़ेंगे तो सूरतगढ़ की बहोत सी बातें छूट जायेंगी. इसलिए आइये एक बार फिर कदम थोड़ा सा पीछे कीजिये और मेरे साथ चले चलिए सूरतगढ़.

यू पी एस सी से प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव की वकेंसीज़ निकली थी. हर तरफ उसी का शोर था. मैंने भी फॉर्म भर दिया था. मैंने खुद अपने आपका मुवाज़ना करने की कोशिश की तो मुझे महसूस हुआ कि मेरा सबसे मज़बूत पहलू है नाटक. पोस्ट्स जो थीं वो जनरल स्पोकन वर्ड्स की थीं या संगीत की. संगीत में रुचि तो रही मगर कभी बाकायदा सीख नहीं पाया. हाँ, जब जब भी नाटक करने माइक्रोफ़ोन के सामने खडा हुआ तो हर तरफ से मुझे तालियाँ मिलीं. कॉलेज के दिनों में और उसके बाद स्टेज भी किया था लेकिन रेडियो ज्वाइन करने के बाद स्टेज एक तरह से छूट सा गया था. रेडियो ड्रामा में मुझे अपने आप पर पूरा भरोसा था लेकिन स्टेज इतना नहीं किया था कि पूरे एतमाद के साथ कह सकूं कि स्टेज ड्रामा में मेरा स्पेशलाइजेशन है. मैंने एक योजना बनाई. उस वक़्त तक के उन सारे नाटकों की किताबें इकट्ठी कीं जो उपलब्ध हो सकती थीं. इसमें मेरी सबसे ज्यादा मदद की वागीश कुमार सिंह ने जो कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की पढाई पूरी कर चुका था और अब स्कूल की ही रेपेट्री में रहकर नाटक कर रहा था. करीब चार महीने बाद यू पी एस सी का इम्तहान होने वाला था. मैंने करीब पचास-साठ नाटक चुने और उन नाटकों को कई कई बार पढ़ते हुए अपने आपको यकीन दिलाया कि मैंने इन नाटकों में ये ये किरदार किये हैं. हर चरित्र को मैंने बिना स्टेज पर किये ही कुछ इस तरह जिया कि कुछ दिन बाद मुझे महसूस होने लगा कि मैंने सचमुच ये नाटक किये हैं और उनमे अमुक अमुक रोल किये हैं. तीन महीने बीतते बीतते हालत ये हो गयी थी कि अगर कोई मुझे नींद में भी पूछ लेता कि फलां नाटक में तुमने कौन सा रोल किया था, करके बताओ. तो मैं उस पूरे किरदार को नींद में रहते हुए भी पूरी तरह जी सकता था. आखिर के एक महीने में मैंने हर नाटक के पात्रों का बहोत सूक्ष्म तरीके से विश्लेषण करते हुए उनपर बड़े बड़े लेख लिख डाले. ये सारी तैयारी मेरे बहोत काम आई. एक कहावत है कि आप किसी झूठ को सौ बार बोलो तो खुद आपको भी सच लगने लगता है. मैं इसी कहावत को अपने जीवन में उतारकर एक एक्सपेरिमेंट करने जा रहा था.

यू पी एस सी के इंटरव्यू की तारीख आ गयी थी. मैं दिल्ली पहुंचा . पता चला कि बोर्ड में डायरेक्टर जनरल श्री अमृत राव शिंदे और नाटककार श्री लक्ष्मी नारायण लाल भी शामिल हैं. इन वेकेंसीज़ में नाटक की तो एक भी वेकेंसी थी नहीं इसलिए ये उम्मीद तो की नहीं जा सकती थी कि मेरा इंटरव्यू  स्वाभाविक तौर पर नाटक पर किया जाएगा. मुझे करना ये था कि मैं किसी तरह अपने इंटरव्यू को घुमा फिराकर नाटक की तरफ ले आऊँ और जो कुछ तैयारी मैंने की थी, उसे बोर्ड के सामने किसी तरह रख सकूं. मैं इंटरव्यू वाले कमरे में घुसा. सबसे पहले एक दो रस्मी सवाल पूछे गए. जाने कैसे धीरे धीरे इकोनॉमिक्स से रेडियो होते हुए इंटरव्यू रेडियो ड्रामा तक आ पहुंचा और इंटरव्यू शुरू होने के 3-4 मिनट के अन्दर ही स्टेज ड्रामा पर आ गया. अब मुझे इंटरव्यू में मज़ा आने लगा था. 45 मिनट के इंटरव्यू में मैंने बोर्ड को पूरा विश्वास दिला दिया कि मैंने स्टेज पर वो सभी नाटक किये हैं जिनके बारे में चर्चाएँ हुई थीं.

कुछ ही दिनों बाद दिल्ली से खबर मिली कि प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव के इंटरव्यू में पास हुए लोगों की मेनलिस्ट में तो मेरा नाम नहीं है मगर वेटिंग लिस्ट में मेरा पहला नंबर है. मुझे फिर भट्ट जी की कही बात याद आई, “ सुनो महेंद्र आजकल के ज़माने में असली लिस्ट वेटिंग लिस्ट नंबर एक से ही शुरू होती है. “ मैंने अपने अब तक के करियर पर निगाह डाली. मैं एनाउंसर के इम्तहान में भी वेटिंग नंबर एक पर था, ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिव के इम्तहान में भी वेटिंग नंबर एक पर था और अब प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव के इम्तहान में भी अपनी उसी जगह पर अड़ा हुआ था. बस इस खबर के मिलने के कुछ ही दिन बाद हमारे डायरेक्टर साहब का ट्रान्सफर दिल्ली हो गया था.  

जब हमने डायरेक्टर साहब के दिल्ली ट्रान्सफर के बारे में सुना तो काफ़ी परेशान हुए थे क्योंकि अब तक जाहिरा तौर पर उनसे बहोत अच्छे ताल्लुकात बन चुके थे और दिन रात काम करने के बावजूद हमें दफ्तर से किसी तरह का कोई शिकवा नहीं था. उर्दू की एक कहावत है, बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुबहान अल्लाह. एक बार फिर ये कहावत हमें सही होती हुई नज़र आई . हुआ ये कि एक रोज़ खाना खाकर मैं दफ्तर लौटा तो डायरेक्टर साहब के कमरे के सामने भीड़ सी लगी हुई थी. मुझे कुछ समझ नहीं आया कि आखिर हुआ क्या है? इधर उधर लोगों से पूछा तो लोगों ने हंस हंसकर जो वाकया सुनाया उस पर मुझे भी हंसी आये बिना नहीं रही.

हुआ ये कि डायरेक्टर साहब का ट्रान्सफर तो हो ही चुका था . वो इंतज़ार कर रहे थे कि कोई आकर उनसे चार्ज ले और वो उस गरीब और पिछड़े हुए से गांवनुमा कस्बे से पीछा छुडाकर देश की राजधानी दिल्ली में जाकर अपने नए सिंहासन पर बिराजें. उधर जिन साहब को इस कुर्सी पर बैठना था उनके लिए ये एक बहोत बड़ी कुर्सी थी. वो किसी छोटे से स्टेशन पर महज़ एक फ़ार्म रेडियो अफसर थे. आप अगर आकाशवाणी का मैन्युअल उठाकर देखें तो एक प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव की ड्यूटीज़ तीन पेज में दी हुई हैं जबकि एक फार्म रेडियो ऑफिसर की ड्यूटीज़ सिर्फ तीन लाइन्स में. ऐसे में कोई फार्म रेडियो ऑफिसर डायरेक्टर की कुर्सी तक पहुँचने का ख्वाब भी नहीं देख सकता था. उनका भाग्य कि वो एक ऐसे तबके के थे जिन्हें हर जगह तवज्जो दी जा रही थी. डायरेक्टर की कुछ पोस्ट्स निकली जो सिर्फ और सिर्फ उनके ही तबके के लोगों के लिए थीं. उन्होंने अप्लाई किया, बिना किसी बड़ी दिक्क़त के उसमे पास हो गए. जैसे ही उन्हें पास होने का समाचार मिला और सूरतगढ़ पोस्टिंग का ऑफर मिला, उन्होंने नक़्शे में सूरतगढ़ ढूंढा और आव देखा न ताव , सूरतगढ़ के लिए रवाना हो गए. सूरतगढ़ आकर उस गांवनुमा कस्बे को देखकर एक बार थोड़े घबराए लेकिन डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठने की कल्पना ने मानो उनके पंख लगा दिए. रेलवे स्टेशन के बाहर एक घटिया से ढाबे में उन्होंने अपना सामान रखा, नहाए धोये, खाना खाया और एक साइकिल रिक्शा लेकर आकाशवाणी जा पहुंचे.

उस वक़्त तक लंच टाइम हो चुका था और हमारे आउटगोइंग डायरेक्टर साहेब लंच के लिए जा चुके थे. मैदान खाली था. नए डायरेक्टर साहब दफ्तर में आये और आकर न किसी से बात की न किसी से कुछ पूछा, डायरेक्टर के कमरे में आकर उस कुर्सी पर बिराजमान हो गए जो कि डायरेक्टर के लिए तयशुदा थी. उन्होंने तो बेचारों ने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि वो डायरेक्टर की इस कुर्सी पर बैठ सकते हैं. अब उनके पास इस पोस्ट का अपॉइंटमेंट लैटर भी था और कुर्सी भी खाली पडी थी. दफ्तर में जो लोग मौजूद थे , उन्होंने झाँक कर डायरेक्टर साहब के कमरे में देखा कि एक काला सा छोटे क़द का  इंसान डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठा हुआ फ़ोन पर बातें किये जा रहा है . सूरतगढ़ में उन दिनों फोन पर लॉक तो बहोत दूर की बात थी, डायल वाला फ़ोन भी नहीं था. फ़ोन उठाने पर उधर से ऑपेरटर पूछता था, नंबर पिलीज़ और तब आप जो नंबर बताते थे वो उस नंबर से जोड़ देता था.

हमारे नए डायरेक्टर साहेब उस कुर्सी का आनंद उठाते हुए फोन पर फोन किये जा रहे थे कि तभी आउटगोइंग डायरेक्टर साहब खाना खाकर लौटे. जैसे ही अपने कमरे में घुसने को हुए , देखा एक आदमी उनकी कुर्सी पर पसरा हुआ फ़ोन पर किसी से बड़े इत्मीनान से बातें कर रहा है. वो एकदम  चकराए कि ये क्या माजरा है? फ़ोन पर बात करते करते ही उस आदमी ने हाथ के इशारे से हमारे आउटगोइंग डायरेक्टर साहब को बैठने को कहा. वो बेचारे बैठ गए. थोड़ी देर गपियाने के बाद नए डायरेक्टर साहब ने फोन क्रेडिल पर पटका और वैसे ही पसरे पसरे कहा , “ हां बोलो, क्या बात है ?”

आउटगोइंग डायरेक्टर साहब को समझ नहीं आया कि क्या जवाब दे. उन्होंने सिर्फ इतना सा कहा, “ जी आप............?”

“देख नहीं रहे हो डायरेक्टर के कमरे में डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठा हूँ तो यकीनन डायरेक्टर ही हूँ. आप कौन हैं और क्या चाहिए आपको ?
“जी मैं भी डायरेक्टर ही हूँ. अब तक इस कुर्सी पर मैं ही बैठता था और मेरे ख़याल से जब तक मैं आपको चार्ज नहीं दे देता, मैं ही इस स्टेशन का डायरेक्टर हूँ.”

“देखो जी फालतू की बात तो करो मत ना मुझसे. ये मेरा अपॉइंटमेंट लैटर है. इसके मिलते ही मैं इस स्टेशन का डायरेक्टर हो लिया .”

आउटगोइंग डायरेक्टर साहब के चेहरे पर पसीना आ गया. वो उस इंसान को कैसे समझाते कि जब तक वो नए साहब को चार्ज नहीं देते वही डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठने के हक़दार थे. उन्होंने अपना पसीना पोंछा, बाहर खड़े चपरासी से कहा कि अकाउंटेंट को बुलाये. अकाउंटेंट आया, उसी वक़्त चार्ज हैन्डिंग ओवर टेकिंग ओवर हुआ और हमारे आउटगोइंग डायरेक्टर साहब अपने दो चार ज़रूरी कागज़ात उठाकर चुपचाप दफ्तर से निकल गए.

अब नए डायरेक्टर साहब ने फ़ौरन एक मीटिंग बुलाई जिसमे ड्यूटीरूम के स्टाफ को भी बुलाया गया. लिहाजा हम लोग भी उस मीटिंग में पहुंचे. उनके पहले प्रवचन से साफ़ हो गया कि जिस पोस्ट से उठाकर सरकारी नियमों ने उन्हें डायरेक्टर की कुर्सी पर बिठा दिया है उस पोस्ट का असर अभी कुछ रोज़ उनके जेहन से जा नहीं सकता. वो अब भी उसी तरह बात कर रहे थे मानो फार्म रेडियो ऑफिसर हों. उनके बोलने में कहीं भी एक डायरेक्टर की संजीदगी नहीं थी.

उन दिनों सूरतगढ़ में आकाशवाणी की कॉलोनी तो बन गयी थी मगर एक बेडरूम के फ्लैट्स ही बने थे. डायरेक्टर और दीगर अफसरों के लिए बड़े फ्लैट्स नहीं बने थे. हम लोग भी एक फ्लैट में आ गए थे और हमारी खुशकिस्मती कि हमारे सामने वाले फ्लैट में हमारे डायरेक्टर साहब अपना परिवार लेकर आ चुके थे. सिर्फ सात बच्चे थे उनके. तीन लडकियां, फिर एक लडका और फिर तीन लडकियां. कॉलोनी में सारी औरतें बातें करतीं की जब तीन लड़कियों के बाद एक लड़का हो चुका था, तो फिर ये तीन लडकियां पैदा करने की इन्हें क्या सूझी ? मगर खैर ये तो अपनी अपनी मर्जी है, कोई क्या कर सकता है.?

अब सवाल ये उठता था कि अपने सात बच्चों के साथ वो दो कमरों के इस घर में सोयें कैसे ? ख़ास तौर पर तब जबकि बड़ी लडकियां काफी बड़ी हो गयीं थीं. आखिरकार तय हुआ कि कुछ लोग दो पलंगों के ऊपर सोयेंगे और बाकी लोग उनके नीचे. यानी रात को अगर उनके घर कोई चला जाता तो लगता था, कोई घर न होकर चिड़ियाघर था, जिसमें चारों और कुछ लोग बिखरे रहते थे.

इधर पूरे दफ्तर का हाल खराब हो चुका था क्योंकि जहां पुराने डायरेक्टर साहब बहोत होशियार इंसान थे, नए डायरेक्टर साहब सरकारी नियमों की वजह से डायरेक्टर तो बन गए थे मगर उनमें डायरेक्टर वाली कोई काबलियत नहीं थी. न उन्हें रेडियो के हिसाब से बोलना आता था और ना ही किसी प्रोग्राम की कोई समझ उनमे थी. आकाशवाणी को वो आकाशवाडी बोलते थे और मीटिंग में ऐसी ऐसी बातें करते थे कि पूरे वक़त लोग एक दूसरे के सामने देखकर बस मुस्कुराते ही रहते थे. वो हमेशा मीटिंग में बोलते थे, “ मुझे आकाशवाडी में सुद्ध बोलने वाले ही चाहिए.”

हम लोग बस मुस्कुरा कर रह जाते. मुझसे जब सहन नहीं होता तो मैं बोल दिया करता था, “यस सर हम सुद्ध बोलने की ही कोसिस करते हैं.”

इसी बीच श्री गोकुल गोस्वामी प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव बनकर आ गए. इधर तीन एनाउंसर नए रिक्रूट होकर आ गए. श्री मोहम्मद सलीम बनारस से, श्री ओमकार नाथ मिश्र बिहार से और एक साहब श्री जय प्रकाश दुबे राजस्थान से ही . एक बहोत मज़ेदार बात हुई . एक रोज़ जब ऑफिस आया तो देखा कुछ सामान दफ्तर में रखा हुआ था. दो तीन सूटकेस और एक बेडिंग. उत्सुकता के साथ मैंने सामान पर नज़र डाली, उस पर कुछ कार्ड्स लगे हुए थे. मैंने कार्ड पढ़ा, जयप्रकाश दुबे, उद्घोषक, आकाशवाणी, सूरतगढ़. मुझे ताज्जुब हुआ. कौन साहब हैं ये? मैं ड्यूटीरूम में आया तो पांच फुट के एक साहब ने मेरा उसी ड्यूटीरूम में स्वागत किया जिसमे पिछले डेढ़ साल से मैं ड्यूटी कर रहा था. बोले, “मेरा नाम जय प्रकाश दुबे है मैं यहाँ एनाउंसर हूँ.”

मैं मुस्कुराया और बोला, “जी, आपका सामान बाहर देखा, उसपर कई चिप्पियाँ चिपकी हुई थीं आपके नाम की. लेकिन क्या आपने ज्वाइन कर लिया है?”

वो लापरवाही के साथ बोले, “ जी नहीं अभी ज्वाइन तो नहीं किया है लेकिन मेरे पास इस पोस्ट का ऑफर है.”

“ओह..... बहोत अच्छा, लेकिन पहले आप ज्वाइन कर लीजिये. चलिए मैं आपको ज्वाइन करवाता हूँ.”
“अच्छा, आप यहाँ क्लर्क व्लर्क होंगे.”

“हाँ कुछ भी समझ लीजिये. आइये.”

“मैं उन्हें दफ्तर में लेकर आया और अकाउंटेंट को बताया कि ये साहब एनाउंसर हैं, इन्हें ज्वाइन करवा लीजिये.”

वो ज्वाइन करने की फोर्मेलिटीज़ में लग गए और मैं अपने काम में लग गया. 
तीनों उद्घोषकों ने ज्वाइन कर लिया था. ओमकार नाथ मिश्र तम्बाकू का पान अपने मुंह में दबाये हुए अपना काम करते थे और आचार्य जी की तरह ठहाके लगाया करते थे, मोहम्मद सलीम राही, थोड़े संजीदा किस्म के इंसान थे और हमारे दुबे जी जो एनाउंसर की पोस्ट को शायद प्रधान मंत्री की पोस्ट से बस थोड़ी सी छोटी पोस्ट मानते थे, पूरे शहर में अपना परिचय दे देकर घूमते फिरते थे.

इधर मेरा बीकानेर का कोर्ट केस चल रहा था. हर पंद्रह बीस दिन में एक बार मुझे बीकानेर जाना होता था और मेरी ये यात्रा मेरे लिए बहोत तकलीफदेह होती थी क्योंकि कोर्ट में मैं एक मुल्ज़िम था, 179, 337 338 के साथ साथ attempt  to murder केस का. कोर्ट में जाते ही हर सीढ़ी पर कुछ रुपये चढाने होते थे और हर इंसान वहाँ मुझे अजीब सी नज़रों से देखता था. ऐसे में मेरा भरपूर साथ दिया बोहरा जी ने. वो सूरतगढ़ से बीकानेर तक मेरे साथ मेरी बन्दूक उठाकर चला करते थे और पूरे वक़्त मेरे साथ रहते थे. मुझे नहीं पता कि मैं उनके लिए क्या कर पाया लेकिन उन्होंने मेरे उस मुश्किल वक़्त में जिस तरह से साथ दिया , उसे में ताउम्र नहीं भूल सकता.

सब लोगों को ये तो पता चल चुका था कि मेरा सलेक्शन प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव की पोस्ट के लिए हो चुका है. जाने ये लोगों के मन की जलन थी या मेरे बर्ताव में ही कोई कमी थी कि कई लोग मुझसे पंगा लेने को तैयार ही बैठे रहते थे. बीकानेर की मेरी मित्र मंडली ने इस बीच मेरे ऊपर कई उलटे सीधे कोर्ट केस दायर कर दिए थे. इधर मैं वो सारे केस लड़ रहा था उधर सूरतगढ़ के मेरे दफ्तर में ख़ास तौर पर कई इंजीनियर बिना किसी वजह से मुझसे पंगा ले रहे थे क्योंकि सब समझते थे कि कोई भी मुझसे झगड़ा करेगा तो गलती मेरी ही मानी जायेगी क्योंकि मेरे खिलाफ कई कोर्ट केस चल रहे हैं और मेरा ट्रान्सफर पनिशमेंट के तौर पर हुआ है.

एक इंजीनियर साहब थे श्री के...... माफ़ करें पूरे नाम नहीं लिखूंगा ऐसे लोगों के क्योंकि एक तो उन्हें पब्लिसिटी नहीं देना चाहता, दूसरे बहोत साल गुज़र गए इन बातों को, हो सकता है वो अपने पोतों पड़पोतों के साथ बैठ कर इस किताब को पढ़ें तो अपने आगे की पीढ़ियों के बीच नाहक उनकी इज्ज़त खराब हो जायेगी. एक दिन एक रिकॉर्डिंग के लिए बाहर गया था मैं. लौटा तब तक रात के १२ बज गए थे. आकाशवाणी का रिकॉर्डर और कुछ टेप्स मेरे पास थे, जिन्हें मैं घर नहीं ले जा सकता था. मैंने स्टूडियो का ताला खुलवाया और टेप रिकॉर्डर ड्यूटी रूम में रख दिया. टेप्स अपनी अलमारी में रखे क्योंकि अगले दिन मुझे उनसे प्रोग्राम बनाना था.  स्टूडियो बिल्डिंग पर एक सील लगा करती थी जिस पर कंट्रोल रूम के इंजीनियर्स दस्तखत किया करते थे. ज़ाहिर है की ड्यूटी रूम तक जाने के लिए मुझे उस सील को तोड़कर ही जाना था. बस इसी बात ने एक बतंगड़ का रूप  ले लिया. अगले दिन जब के..... महोदय ने देखा कि सील पर मेरे दस्तखत हैं तो वो जोर जोर से चिल्लाने लगे और स्टेशन इंजीनियर के पास जाकर शिकायत की कि मैंने रात को स्टूडियो बिल्डिंग की सील तोड़कर नियम के खिलाफ काम किया है क्योंकि स्टूडियो बिल्डिंग में सील लगाना और उसे तोड़ना सिर्फ इंजीनियर्स का हक होता है. स्टेशन इंजिनियर  विजय साहेब बहोत संजीदा और मुहज्ज़ब इंसान थे . उन्होंने के..... साहब को समझाया कि वो बात का बतंगड़ ना बनाएं, जो हुआ उसमे कुछ भी गलत नहीं हुआ लेकिन के..... साहब कुछ ज़्यादा ही जोश में थे. मैं अगले दिन डबिंग रूम में कुछ काम कर रहा था, वो आये और बोलने लगे, “आपने सील तोड़ने की हिम्मत कैसे की?” मैंने कहा, “ज़रा आप सोच कर देखिये कि उस वक़्त मैं और क्या कर सकता था?”

“मैं कुछ नहीं जानता, ये सिर्फ इन्जिनियर इंचार्ज ही कर सकता है और कान खोलकर सुन लीजिये, आप ब्लडी ड्यूटी ऑफिसर उसके अंडर में ही काम करते हैं.”

ये बात बिलकुल गलत थी. हम ड्यूटी ऑफिसर अपना काम करते थे और इन्जीनियेर्स अपना. कोई एक दूसरे के नीचे या ऊपर काम नहीं करते थे, बल्कि जो लोग रेडियो से जुड़े हुए रहे हैं वो मेरी बात की ताईद करेंगे कि जब भी कोई फैसला लेने का वक़्त आता था, ड्यूटी ऑफिसर को ही फैसला लेना होता था और इन्जीनियेर्स को उस फैसले के मुताबिक काम करना होता था. के.... साहब पर जाने उस वक़्त क्या भूत सवार था कि वो चिल्ला चिल्लाकर मुझे ज्ञान देने लगे. मैं थोड़ी देर उनकी बातें खामोशी से सुनता रहा. इससे उनका हौसला और बढ़ गया और वो मुझसे झगड़ा करने लगे. अब मैं अपने पर काबू नहीं कर सका. मैंने कहा, “दुबारा कहिये, जो आपने अभी कहा.” वो चिल्लाकर बोले, “ हाँ आप ड्यूटी ऑफिसर हमारे अंडर में काम करते हैं.”

बस इतना बहोत था मेरे सब्र को तोड़ने के लिए. मैंने उनकी कॉलर पकड़ी, तीन चार बार उनके सर को दीवार से टकरा दिया, खींचकर दो झापड़ उनके मुंह पर रसीद कर दिए और बोला, “ये ले अफसर के बच्चे, झाड अपनी अफसरी अब जहां भी झाड़नी हो.”

वो हक्के बक्के रह गए. अपने गालों को सहला रहे थे कि एक तकनीशियन ने डबिंग रूम के शीशे  से झाँक कर देखा और दो मिनट में पूरे ऑफिस में ये बात फैल गई थी कि मैंने के........ साहब की पिटाई कर दी है. लोगों ने उन्हे बहोत भरा कि वो मेरी शिकायत करें लेकिन उनकी हिम्मत नहीं हुई. इसी बीच ये बात घूमती घामती न जाने कैसे उनके घर तक पहुँच गई. उनकी बीवी ने उन्हें धिक्कारा कि वो मार खाकर आ गए. पूरे ऑफिस के लोगों में चर्चा हो रही थी कि वो मेरे हाथ से पिट गए, उसका असर उनपर इतना नहीं हुआ लेकिन जब उनकी बीवी ने उन्हें इसी बात के लिए धिक्कारा तो वो सहन नहीं कर पाए और मुझे मज़ा चखाने का मौक़ा ढूँढने लगे.

आकाशवाणी काफी दूर था, शहर से. सभी लोग शाम की ड्यूटी में पैदल आया करते थे ताकि रात में ऑफिस की कार से लौट सकें. दो तीन दिन बाद ही मेरी भी शाम की ड्यूटी थी और उनकी भी. तब तक हम लोग पूरी तरह से कॉलोनी में शिफ्ट नहीं हुए थे. जब मैं आकाशवाणी के पीछे के मैदान को पार कर रहा था, के..... साहब मेरे पास आ कर मुझे ललकारने लगे. मैंने कहा, “जाओ यार जितनी मार खा ली क्या वो काफी नहीं है?”

उन्हें शायद अपनी बीवी की धिक्कार याद आने लगी, वो मेरे ऊपर टूट पड़े, मैं उन्हें अपने ऊपर से हटाता रहा, लेकिन जब मुझे लगा कि वो इस तरह नहीं हटने वाले. मैंने अपने हाथ खोले और उनकी पिटाई करने लगा. वो बेचारे डेढ़ पसली के इंसान. बस मार खाने लगे और मैं उनकी जमकर पिटाई करने लगा. उनके मुंह से खून बहने लगा और खूब अच्छी तरह मार खाकर आखिरकार वो वहाँ से भाग लिए. जाकर स्टेशन इंजीनियर विजय साहब को अपनी चोटों के निशान दिखाए. विजय साहेब ने उनसे कहा कि चूंकि मारपीट ऑफिस से बाहर हुई है, उन्हें खुद पुलिस में रिपोर्ट करवानी चाहिए. वो पुलिस स्टेशन गए भी लेकिन बोहरा जी जैसे मेरे दोस्तों ने जाकर उनके कान में कहा कि अगर वो रिपोर्ट करेंगे तो बाहर उनकी खैरियत नहीं. अभी तो थोड़ी ही मार पडी है, अगर पुलिस का झमेला किया तो मार मारकर उनका भुरता बना दिया जाएगा. बुनियादी तौर पर डरपोक इंसान तो थे ही, बस बीवी के चढाने पर लड़ने आ गए थे, जब उन्होंने सुना कि और पिटाई होने के आसार बन रहे हैं तो हारकर वो वहाँ से लौट आए और थोड़े ही दिन बाद अपना ट्रान्सफर करवाकर भाग लिए.

एक और इंजिनीयर साहब थे श्री बी........ जो कण्ट्रोल रूम में ड्यूटी कर रहे थे. मैं ड्यूटीरूम में ड्यूटी कर रहा था. रेडियो पर जो भी प्रोग्राम चलता उसे सुनना मेरी ड्यूटी थी. दिन का वक़्त था. स्टूडियो से कोई प्रोग्राम चल रहा था कि अचानक वो रुक गया और मुझे किसी और भाषा के कुछ ऊटपटांग शब्द सुनाई दिए. मैंने कण्ट्रोल रूम में फोन किया कि भाई ये क्या हो रहा है? उधर से आवाज़ आई, जो हो रहा है, ठीक हो रहा है, आप अपना काम कीजिये. मैंने शान्ति से जवाब दिया कि भाई आपको बताकर कि ब्रॉडकास्ट में कुछ गड़बड़ हो रही है, मैं अपना काम ही कर रहा हूँ. उधर से आवाज़ आई, “यू शट योर ब्लडी माउथ”. मैंने उनसे कुछ भी गलत नहीं कहा था, बस जो गलती ब्रॉडकास्ट में हो रही थी, उस ओर इशारा भर किया था. मैंने सोचा, जाने दो घर से लड़कर आये होंगे. कुछ ही मिनट गुज़रे होंगे कि फिर स्टूडियो का प्रोग्राम रुक गया और कुछ सेकंड्स के लिए किसी अजनबी जुबान में कुछ शब्द रेडियो पर आये. अब मैं उठकर कण्ट्रोल रूम की तरफ भागा. वहाँ जाकर देखा कि बी........ साहब मशीनों के साथ कुछ छेड़ छाड़ कर रहे हैं. मैंने कहा, “रेडियो पर चलते प्रोग्राम के बीच ये क्या कर रहे हैं आप ?”

इस पर उन्हें गुस्सा आ गया. वो चिल्लाये, “बाहर निकलो यहाँ से. ये कंट्रोल रूम है, यहाँ तुम्हारे बाप का राज नहीं चलता.”

इतना सुनना था कि मैं अपना आपा खो बैठा. मैंने कण्ट्रोल रूम में हमेशा मौजूद रहने वाली दो पैच कॉर्ड्स उठाई और उन पर टूट पडा. पैच कॉर्ड्स हंटर की तरह उनपर बरस रही थीं, वो नीचे गिरे हुए मार खा रहे थे और गालियाँ निकाल रहे थे. कण्ट्रोल रूम में ही मौजूद टेक्नीशियन ने भागकर स्टेशन इंजीनियर श्री आर सी विजय को इत्तेला दी. वो भागे हुए आये, लेकिन वो आये तब तक बी....... साहब की अच्छी तरह ठुकाई हो चुकी थी. विजय साहब ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने कमरे में लेजाकर बोले, “ ये क्या करते हो महेंद्र तुम? आगे ही तुम्हारे ऊपर इतने कोर्ट केसेज़ चल रहे हैं, फिर नए बखेड़े क्यों खड़े कर रहे हो?”

            मैंने कहा, “ सर यहाँ हर इंसान सोचता है कि झगडा वो करेगा मुझसे और मारपीट भी कर लेगा लेकिन क्योंकि मुझ पर कोर्ट केस चल रहे हैं तो गलत मुझे ही माना जाएगा. अब मैंने इसकी परवाह करनी छोड़ दी है कि लोग क्या सोचते हैं. जो मुझसे पंगा लेगा मैं उसे ठीक कर दूंगा. जो होगा सो देखा जाएगा. दो चार कोर्ट केस और सही.”

चढ़ाने वालों ने बी........... साहब को भी चढ़ाया लेकिन उनकी हिम्मत नहीं हुई मेरे खिलाफ कुछ लिखकर देने की क्योंकि उन्हें पता था कि वो लिखकर दे देंगे तो मेरे खिलाफ दफ्तर की कार्यवाही तो शुरू हो जायेगी लेकिन दफ्तर के बाहर अगर उन्हें मार पड़ी तो उन्हें कौन बचाने आयेगा. के.......... साहब की दुर्गति वो देख ही चुके थे.

इस तरह मैं सीधा सादा इंसान अब घोषित बदमाश बनता जा रहा था. कई बार मैं बैठे बैठे सोचा करता, क्यों ये दुनिया किसी सीधे सादे इंसान को इतना दबाने की कोशिश करती है कि उसे ज़ुल्म के खिलाफ खड़े हो जाना पड़ता है. किसी भी इंसान के क्रिमिनल बनने की शायद यही प्रक्रिया होती है.

एक तरफ जहाँ मैं सूरतगढ़ में बहोत दिल लगाकर मेहनत कर रहा था. हमने एनाउंसर और ड्रामा कलाकारों के ऑडिशन किये जिनमे पास हुए लोगों को ट्रेनिंग देने की ज़िम्मेदारी भी मुझे सौंपी गई, दूसरी तरफ अब स्टाफ के लोग मुझसे छेड़खानी करने में डरने लगे थे क्योंकि दो तीन लोग मेरे हाथ से पिट चुके थे. अन्दर से मैं उतना ही सीधा सादा प्राणी था, जितना रेडियो ज्वाइन करने के वक़्त था, लेकिन वक़्त और हालात ने मुझे ऊपर से एक सख्तजान लड़ाका इंसान बना दिया था.

आकाशवाणी सूरतगढ़ में नाटक की शुरुआत नरेन्द्र आचार्य जी ने की एक धारावाहिक के साथ. इस धारावाहिक का नाम था “न नमक न मिर्च”. इसमें दो पात्र होते थे और दोनों ही पात्र आचार्य जी ने निश्चित कर दिए थे. पुरुष पात्र मैं हुआ करता था और स्त्री पात्र सुश्री सुनंदा ओहरी हुआ करती थीं. पहले कुछ एपिसोड संगरिया में रहने वाले मशहूर लेखक श्री गोविन्द शर्मा ने लिखे थे, उसके बाद कभी गोविन्द जी लिखते थे तो कभी खुद नरेन्द्र आचार्य जी. ये साप्ताहिक धारावाहिक श्रोताओं में बहोत पोपुलर हुआ.

मोहम्मद सलीम भी नाटक लिखा करते थे, मैं भी कुछ टूटा फूटा लिख लिया करता था, आचार्य जी तो नाटक के आदमी थे ही. कुल मिलाकर नाटक का अच्छा माहौल आकाशवाणी सूरतगढ़ में बनने लगा था. आये दिन हममे से कोई एक इंसान नाटक लिखकर लाता और फिर सब उसपर चर्चा करते. हर तरह से जब नाटक की तहरीर दुरुस्त हो जाती तो हम लोग उसे मिलकर प्रोड्यूस किया करते. हर इंसान हर काम करने को तैयार रहता. हम सब मिलकर काम कर रहे थे लेकिन हमारे ऊपर जो साहब बैठे थे, वो तो “आकासवाड़ी” और “सुद्ध” बोलने वाले इंसान थे. उन्हें इन सबसे कोई लेना देना नहीं था. हाँ हम जो काम करना चाहते, उसमे कोई टांग नहीं अड़ाते थे. यानी काम करने की पूरी आज़ादी हमें थी.

इस वक़्त तक हमारे डायरेक्टर साहब काम के मामले में तो जीरो थे, मगर थे पूरे ईमानदार. रोज़ साइकिल रिक्शा से बाज़ार जाकर सब्जी लाते थे. किसी सरकारी सहूलियत का बेजा इस्तेमाल नहीं करते थे. सूरतगढ़ में एयर फ़ोर्स का बहोत बड़ा स्टेशन था. सैनिकों के लिए आकाशवाणी की तरफ से भी प्रोग्राम किये जाते थे और वैसे भी डिफेन्स के अफसर अपने जवानों के लिए आये दिन कुछ ना कुछ आयोजन करते ही रहते थे. इन आयोजनों में बाकी चाहे कुछ हो न हो, दारू की नदियाँ तो बहती ही थीं. इन सारे प्रोग्राम्स में हमारे डायरेक्टर साहब को भी बुलाया जाता. बस वहाँ से शुरू हुआ हमारे डायरेक्टर साहब की ज़िंदगी का एक नया चैप्टर. वो इंसान जो कभी कभार एक दो पैग ले लिया करता था, अब एयर फ़ोर्स की पार्टियों में जा जाकर बेतहाशा पीने लगा. कई बार तो मैंने अपनी आँखों से देखा कि नशे में बुरी तरह धुत वो एयर फ़ोर्स के अफसरों के सामने कुच्छ भी अंट शंट बोले चले जा रहे हैं. जैसे ही दारू की ट्रे उनके सामने आई, उन्होंने फिर एक ग्लास उठा लिया. उसमे से एक घूँट भरकर पास की टेबल पर रखा तो अनिल राम जी ने उस ग्लास को पास की झाड़ियों में खाली कर दिया. डायरेक्टर साहब तो नशे में इतने डूबे हुए रहते थे कि उन्हें याद भी नहीं रह सकता था कि उन्होंने अभी तो उस ग्लास में से एक ही घूँट भरा था, सारी दारू कहाँ चली गयी ? वो तो फिर से दूसरा ग्लास उठाकर शुरू हो जाते थे. अनिल जी फिर अपनी वही कारस्तानी दोहराते थे. इस कहानी का अंत एक ही तरह से हुआ करता था. डायरेक्टर साहब होश खोकर उल्टियां करने लगते थे और उन्हें गाडी में डालकर मुश्किल से घर लाया जाता था.

लोगों ने डायरेक्टर साहब को कहना शुरू कर दिया था कि दफ्तर में दो दो गाड़ियां होते हुए वो सब्जी लेने रिक्शा में जाते हैं तो क्या ये अच्छा लगता है? ये उनकी शान के खिलाफ है. एक दो बार वो डरते डरते गाडी लेकर बाज़ार गए, देखा कुछ नहीं हुआ तो हौसला खुल गया. अब वो अपने पूरे परिवार के साथ आकाशवाणी की गाड़ियों का भरपूर ज़ाती इस्तेमाल करने लगे. एक ईमानदार अफसर धीरे धीरे एक करप्ट अफसर में तब्दील हो रहा था. आटे में नमक जितनी बेईमानी तो सभी जगह चल जाती है लेकिन हमारे साहब इससे बहोत आगे निकल रहे थे. मैंने इन्हीं के बारे में इस किताब में एक जगह लिखा है कि स्टाफ के रिक्रूटमेंट में इन साहब ने लाखों रुपये की घूस लेकर ऐसे लोगों को भर लिया जो उन कुर्सियों के कतई हक़दार नहीं थे. जाने लोग इतिहास से कोई सबक क्यों नहीं लेते ? इतिहास भरा पडा है ऐसे लोगों के कारनामों से और उसके बाद उनके अंजाम से. इस तरह के किरदार के लोगों को आखिरकार अपने किये हर ऐसे काम की भारी कीमत चुकानी पड़ती है और इन साहब को भी चुकानी पड़ी. जब दूरदर्शन जयपुर के डायरेक्टर थे, घूस के एक केस में पकड़े गए और रिटायरमेंट से कुछ ही दिन पहले सस्पैंड कर दिए गए.





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