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Sunday, January 21, 2018

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग- 53 ( महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला )




वो दिन भी आ गया, जबकि नए डायरेक्टर साहब को ज्वाइन करना था. मैं और खरे साहब उन्हें लेने स्टेशन गए. “ओरे बाबा..... ओरे बाबा” करते  बंगाली बाबू हम दोनों से गले लगकर मिले. हमने स्टेशन के सामने ही बने डाक बंगले में उनके रुकने का इंतज़ाम कर दिया था. उन्हें डाक बंगले में ठहरा दिया गया. कमरे में उनका सामान रखवाकर खरे साहब ने कहा, “ठीक है सर आप नहा धो लें. हम लोग चलते हैं. आपको गाडी कितनी देर में भेजें ?”
“ओरे नोहीं, हम ओभी 15 मिनट में रेडी हो जाता है. आप दोनों चाय पियो तोब तक हम नहा लेगा. फिर आप लोक के साथ ही चोलता है.”
ये तो कहने की बात थी कि हम लोग चाय पियें तब तक वो नहा लेंगे. मुझे तो चाय पीनी है नहीं थी और खरे साहब को भी कहना पडा, “ठीक है सर आप नहाकर आ जाइए, तब तक मैं चाय ऑर्डर करता हूँ. आपके नहाने के बाद साथ ही चाय पियेंगे. फिर ऑफिस निकला जाएगा.”                      
दस मिनट में  वो नहा-धो कर आ गए. चाय के दो ही कप देखकर बोले, “खोरे, चाय दो ही कोप में क्यों ? कौन नहीं पिएगा ?”
“जी ये मोदी चाय नहीं पीता.”
“ओह.........मोदी चाय नहीं पीता....... तो क्या पीता है मोदी ?दारू ?”और ठहाका लगाकर हंस पड़े.
मुझे बिलकुल समझ नहीं आया कि इसमें ठहाका लगाने की भला क्या बात थी. मैंने भरसक नम्र रहते हुए कहा, “जी नहीं सर, मैं कुछ नहीं पीता.”
चाय पीकर वो हमारे साथ ही ऑफिस आ गए. वैष्णव साहब ने अपनी डायरेक्टर वाली कुर्सी बंगाली बाबू को सौंप दी. उसी दिन वैष्णव साहब रिलीव हो गए और दो दिन बाद हम लोग फिर रेलवे स्टेशन पर खड़े थे, उन्हें विदा करने के लिए. दो चार लोगों के अलावा बाकी सभी लोग दुखी थे कि एक अच्छे ऑफिसर उन्हें छोड़कर जा रहे थे. न जाने नया आने वाला कैसा होगा. किसी भी सरकारी दफ्तर में हैड ऑफ द ऑफिस उस पूरे दफ्तर के परिवार का मुखिया होता है. अगर वो अक्लमंद है तो ऑफिस का पूरा परिवार एकजुट रहता है, ऑफिस एक नज़र न आने वाली अनुशासन की ज़ंजीर से बंधा रहता है जबकि अगर हैड ऑफ द ऑफिस काम न जानने वाला, कमअक्ल क़िस्म का इंसान हो तो ऑफिस का पूरा परिवार बिखर जाता है. इस तरह एक ऑफिसर के जाने और दूसरे ऑफिसर के ज्वाइन करने का ये समय बहोत नाज़ुक होता है.
आकाशवाणी की एक लम्बी रवायत रही है कि हर रोज़ सुबह डायरेक्टर या असिस्टेंट डायरेक्टर के कमरे में एक मीटिंग होती है, जिसे प्रोग्राम मीटिंग कहते हैं. कई बार कुछ डायरेक्टर अपने स्टाफ से कुछ दूरी बनाए रखना चाहते हैं. ऐसे में रोज़ की मीटिंग  प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव (कोऑर्डिनेशन) के कमरे में होती है और हफ्ते में एक दिन मीटिंग डायरेक्टर/ असिस्टेंट डायरेक्टर के कमरे में होती है. ये मीटिंग कितनी लम्बी चलेगी और किन किन मुद्दों पर बहस मुबाहसे होंगे ये इस पर निर्भर करता है कि ऑफिसर किस मिज़ाज का है. मैंने अपनी 37 साल की नौकरी के दौरान ऐसे अफसर भी देखे जो पंद्रह मिनट में मीटिंग ख़त्म कर देते थे और आकाशवाणी, कोटा के एक हाँकू असिस्टेंट डायरेक्टर जैसे अफसर भी देखे जो लंच तक भी मीटिंग ख़त्म नहीं कर पाते थे और लंच के बाद भी मीटिंग चलती चली जाती थी. उनकी इस मीटिंग में गप्पों के दौर चलते थे जिसमे वो जनाबेआली तहज़ीब के दायरों को भी भूल जाते थे, ये भी भूल जाते थे कि मीटिंग में सिर्फ मर्द ही नहीं कुछ औरतें भी बैठी हैं. अब आप सोचिये कि जब ऑफिस के सभी अफसर सुबह साढ़े दस बजे से 3-3.30 बजे का वक़्त मीटिंग के नाम पर गपशप में ज़ाया कर देंगे तो उस ऑफिस में काम क्या हो पायेगा ? और जिस दफ्तर में सभी अफसर इतने लम्बे वक़्त तक डायरेक्टर के कमरे में बैठे गप्पें मारते रहें वहाँ छोटे अफसर और कर्मचारी भला क्यों ऑफिस में रहेंगे और अगर ऑफिस में रह भी गए तो काम तो हरगिज़ नहीं करेंगे. खैर कोटा के उन अज़ीम असिस्टेंट डायरेक्टर की बात तफसील से तब करेंगे जब कि आकाशवाणी कोटा का ज़िक्र आयेगा.
बंगाली बाबू ने अगले दिन मीटिंग में अपने आप को बहोत चुस्त दुरुस्त दिखाने के लिए एक लम्बी सी तक़रीर की जिसमे उन्होंने कहा कि वो एक बहोत सख्त किस्म के इंसान हैं. उनके छोटे क़द को लेकर कोई ये न समझे कि वो किसी भी तरह से कमज़ोर हैं. उन्होंने अनुशासन और प्रोग्राम्स को लेकर कई बड़ी बड़ी बातें कीं. वो जब ये सब कुछ कह रहे थे तो मैं और खरे साहब एक दूसरे की ओर देखकर आँखों ही आँखों में मुस्कुरा रहे थे क्योंकि हम दोनों इन बंगाली बाबू के साथ काम कर चुके थे और जानते थे कि ये साहब सिर्फ बड़ी बड़ी बातें करना ही जानते हैं. एक राजस्थानी कहावत है, “थोथा चिणा बाजे घणा” यानी जो चने खोखले होते हैं वो आवाज़ ज़्यादा करते हैं. ये कहावत इन साहब पर बिलकुल सटीक बैठती थी. मुझे याद आ गया 1976 का वो दिन जब ये साहब आकाशवाणी, जोधपुर में नए नए आये थे और ये साबित करने के लिए कि वो प्रोग्राम बनाना भी जानते हैं, उन्होंने एक प्रोग्राम प्रोड्यूस किया और उस प्रोग्राम की ऐसी दुर्गति की कि पूरा स्टाफ तो उनपर हंसा ही, आकाशवाणी का ट्रांसमीटर एक हाई पॉवर ट्रांसमीटर था इसलिए उनके प्रोग्राम को सुनकर उस ट्रांसमीटर की हद में आने वाले न जाने कितने लाख सुनने वाले भी जी खोलकर हँसे होंगे.
दूसरे दफ्तरों के बारे में तो मैं कुछ कह नहीं सकता लेकिन आकाशवाणी के सभी दफ्तरों में मैंने महसूस किया कि थोड़ी बहोत पॉलिटिक्स तो होती ही है. जब भी कोई नया अफसर आता है तो पॉलिटिक्स के ये खिलाड़ी नए सिरे से नए अंदाज़ में अपनी बिसातें बिछानी शुरू कर देते हैं. उस नए अफसर के चारों तरफ  एक जाल बिछाना शुरू कर देते हैं और कोशिश
करते हैं कि नया आने वाला अफसर आखिरकार उनकी झोली में आकर गिरे. ज़्यादातर डायरेक्टर भी नीचे की पोस्ट्स से प्रमोट होकर ही आगे बढे हुए होते हैं, इसलिए स्टाफ की पॉलिटिक्स और स्टाफ के पैंतरों को अच्छी तरह जानते हैं फिर भी जो समझदार अफसर होते हैं वो तो अपने आपको इन पैंतरों से बचा ले जाते हैं और किसी की गोद में नहीं गिरते लेकिन जो बेवकूफ किस्म के अफसर होते हैं वो अक्सर इन पैन्तरेबाज़ों के चक्कर में आ जाते हैं. ऐसे में काम करने वाले लोग दुःख पाते हैं निकम्मे लोग मौज मारते हैं.
हमारे बंगाली बाबू ने जो लम्बी तक़रीर की उससे उनका  किरदार काफी कुछ सबके सामने आ गया था और अब मीटिंग्स होने लगी थीं उन लोगों की जो अब तक हाशिये पर पड़े हुए थे. उम्मीदों ने उनके सीनों में अंगड़ाइयाँ लीं और उन्ही दिनों मैंने देखा कि वही ए ओ साहब आकाशवाणी बीकानेर के चक्कर काटने लगे थे, जिनका जयपुर ट्रांसफ़र हो चुका था. बीकानेर के लोकल लोगों के उस गुट ने ए ओ साहब की सदारत में नए डायरेक्टर साहब को अपने जाल में लपेटने की पूरी तैयारियां कर ली और जुट गए अपनी साजिशों को अमली जामा पहनाने में.
बाहर से आये लोगों को अपने जाल में फंसाने का इनका एक बड़ा कारगर तरीका था. ये बहोत चालाकी के साथ नए अफसर को बताते थे कि बीकानेर के लोग बहोत अच्छे होते हैं लेकिन सिर्फ उनके साथ जो उनके साथ मिलकर चलें. जो ऐसा नहीं करते, उनके लिए बीकानेर के लोग बहोत खतरनाक भी होते हैं. फिर वो मिलकर अफसर को कई तरह से डराते थे. दूसरी तरफ मदद का हाथ भी बढ़ा देते थे. ऐसे में कमज़ोर अफसर अक्सर इनके जाल में फँस जाते थे और फिर जिसने इस गुट के सामने सरेंडर कर दिया, उसका बीकानेर स्टे आराम से गुज़रता था, बस उस अफसर को हर मामले में उस गुट के सरगनाओं की बात माननी होती थी. यानी ऑफिस के बड़े से बड़े फैसले इन लोगों द्वारा लिए जाते थे. बस अफसर को अपने नाम का ठप्पा लगाना होता था.  
हमारे बंगाली बाबू अपने आपको बहोत बहादुर कहते थे लेकिन अन्दर से एक कमज़ोर अफसर थे. उनके खिलाफ भी कई चालें चली गईं, बीकानेरियों ने अपना विराट रूप दिखाया और बंगाली बाबू फ़ौरन उनके आगे सरेंडर हो गए. उनके आने के कुछ ही दिनों बाद एक ऑफिस आर्डर निकला जिसमें प्रोग्राम सेक्शन के लोगों को काम का बँटवारा कुछ इस तरह से किया गया कि मुझसे बीकानेर दर्पण लेकर किसी और को दे दिया गया. बुरा तो लगा मगर न तो मुझे बीकानेर तक महदूद रहना था और ना ही बीकानेर दर्पण को मैंने कभी अपनी इज्ज़त का सवाल ही बनाया था. पूरे ऑफिस में तरह तरह की चर्चाएँ होने लगीं. सुना जाने लगा कि बंगाली बाबू हम दोनों के ट्रान्सफर की कोशिश कर रहे हैं. हमें उनकी इस कोशिश से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ रहा था. सच पूछा जाए तो हम तो खुद बहोत दिन से बहोत बेमन से बीकानेर में सिर्फ इसलिए पड़े हुए थे कि बेटा वैभव छोटा था, बाई(मेरी बड़ी बहन) की मदद से उसे पालने में हमें बीकानेर में थोड़ी आसानी थी और मेरे पिताजी बीकानेर में ही रहना चाह रहे थे.
अब हमें लग रहा था कि बेहतर हो कि हमारा तबादला कहीं और हो जाए. बेटा भी थोड़ा बडा हो गया था और गंगा चिल्ड्रेन स्कूल में पढ़ रहा था और ये भी एक हकीकत है कि किसी भी एक जगह पर आखिर कितना रुका जा सकता है. इस मामले में मेरा एक उसूल रहा है. आपने पतंग की डोर लपेटने वाली चरखी देखी होगी. जब उस चरखी को हम देखते हैं तो लगता है, इसमें नीचे गहराई तक ना जाने कितना मांझा लिपटा हुआ होगा. लेकिन जब पतंग उड़ाई जाती है और मांझा उस चरखी से निकलने लगता है तो थोड़ी ही देर में चरखी की सींकें नज़र आने लगती हैं. हमारा भ्रम टूट जाता है. हम सोचने लगते हैं कि अरे हम तो सोच रहे थे कि इस चरखी में बहोत गहराई तक मांझा लिपटा हुआ होगा लेकिन इसकी सींकें तो बहोत जल्दी निकल आई.
बिलकुल ऐसा ही दफ्तरों, ख़ास तौर पर आकाशवाणी के दफ्तरों के साथ है. जब हम किसी नए स्टेशन पर ट्रान्सफर लेकर जाते हैं तो लोग अच्छे लगते हैं, गहरे लगते हैं लेकिन इंसान भी दरअसल उस मांझे की चरखी से बहोत अलग नहीं होता. वक़्त के साथ साथ उन गहरे दिखाई देने वाले लोगों की परतें उतरने लगती हैं और कुछ ही वक़्त के बाद उसके अन्दर से सींकें यानी ग़लाज़त झाँकने लगती है.मुझे लगता है, इससे पहले कि हमारे अन्दर की सींकें दूसरों को और दूसरों की सींकें हमें नज़र आने लगे हमें वहाँ से किसी नई ठौर की ओर चल देना चाहिए ताकि अच्छाई और गहराई का ये मुलम्मा बना हुआ रहे. हम भी इस भ्रम में रहें कि उस जगह के लोग बहोत अच्छे थे और वहाँ के लोगों के मन में भी भ्रम बना रहे कि हम अच्छे इंसान हैं.
 ऑफिस में हालात बहोत तेज़ी से बिगड़ते जा रहे थे. तरह तरह की बातें , तरह तरह की अफवाहें हमारे खिलाफ फैलाई जा रही थीं और बीकानेर ठहरा छोटा सा शहर, ये अफवाहें आकाशवाणी बीकानेर की चारदीवारी की हदें पारकर बीकानेर शहर की फसीलों से टकरा कर हमारी समाअत तक लौट रही थीं. एक रोज़ स्टाफ के ही एक खैरख्वाह ने एक तरफ लेजाकर कहा, “भाई साहब ये क्या सुन रहा हूँ?”
मैंने गौर से उनके चेहरे को देखते हुए सवाल के जवाब में सवाल किया, “क्या सुन रहे हैं ?”
“भाई साहब पूरे शहर में चर्चा है कि आजकल आप जेब में पिस्तौल डालकर घूमते हैं?”
“ पिस्तौल ? वो किसलिए ?”
“माफ़ करना भाई साहब, जो सुना वही बता रहा हूँ.”
“अच्छा बोलिए, किसलिए ?”
“ वो..........फलां अनाउंसर  को मारने के लिए.”
“उस अनाउंसर को मारना ही हो तो उसके लिए पिस्तौल जेब में डालकर पूरे शहर में घूमने की क्या ज़रुरत है ? ये काम तो मैं यहाँ दफ्तर में ही कर सकता हूँ.”
“ ये तो पता नहीं मुझे भाई साहब लेकिन ये भी सुना है कि वो अनाउंसर साहब आजकल बहोत डरे डरे घूम रहे हैं.”                                                                                                                                                                  
फरवरी का महीना था, इसी तरह अफवाहों के बाज़ार गर्म थे कि मेरे भाई साहब बीकानेर आये. मुझे अपनी पत्नी को ड्यूटी के लिए ऑफिस ड्रॉप करके आना था. भाई साहब बोले, “कार ले जाओ, हवा चल रही है, स्कूटर पर जाओगे तो ठण्ड लगेगी.”
 मैंने कार की चाबियाँ संभालीं और बाहर आ गया. पत्नी को कार में बिठाकर आकाशवाणी पहुँच गया. उन्हें ड्रॉप करके लौट रहा था. पास के पी एच ई डी के दफ्तर के बाहर सड़क को करीब करीब पूरा रोके हुए एक ट्रक खड़ा हुआ था. मैंने कार को सड़क से नीचे उतारकर ट्रक के सामने से होकर दूसरी तरफ निकलने की कोशिश की. मेरी बदकिस्मती, दूसरी ओर से उसी वक़्त दो साइकिल सवार ट्रक के सामने से निकलने लगे. उन दो में से एक साइकिल सवार थे वही अनाउंसर महोदय, जिन्होंने मेरे बीकानेर आने के दिन से मेरे खिलाफ तरह तरह की साजिशें रची थीं और इन दिनों डरे डरे घूम रहे थे क्योंकि मेरी तरह उन्होंने भी सुना था कि मैं इन दिनों उन्हें मारने के लिए जेब में पिस्तौल डाले घूम रहा हूँ. मेरी कार दूर से तो उन्हें दिखाई नहीं दी क्योंकि पूरी सड़क रोके हुए तो ट्रक खड़ा हुआ था. एक दम इधर में ट्रक को क्रॉस करने लगा और उधर वो. उनकी नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी वो एक दम  हड़बड़ाकर मेरी कार के बाएं पहिये की तरफ आ टकराए.
लोग इकट्ठे हो गए. उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया. पुलिस केस हुआ. पुलिस तफ्तीश के दौरान  ऑफिस में हर इंसान ने कहा कि हम दोनों के बीच झगड़ा था. 279, 337 और 338 में  पुलिस केस के साथ साथ धारा 307 यानी क़त्ल की कोशिश का इस्तगासा(प्राइवेट केस) भी दर्ज हुआ. ऑफिस का एक चपरासी उसी वक़्त चाय लेकर लौट रहा था, उसने पूरा वाकया अपनी आँखों से देखा था लेकिन यहाँ भी नसीब मेरे दुश्मन के पाले में उसका साथ देने के लिए खड़ा था. वो उसी गुट का एक प्यादा था, जो अरसे से मेरे खिलाफ साजिशें रच रहा था. इधर पी एच ई डी का क्लर्क चश्मदीद गवाह बना, जिसने पेशेंट को अपना खून दिया था. उसके हिसाब से अब उन दोनों में खून का रिश्ता बन गया था, इसलिए चाहे उसने अपनी आँखों से हादसा होते हुए नहीं देखा मगर जज्बाती तौर पर खून का रिश्ता होने की वजह से चश्मदीद गवाह बनना उसका फ़र्ज़ हो गया था. लम्बे समय तक पुलिस और कोर्ट की कार्यवाहियां चलीं. मेरा ऑफिस से मन उचट गया था. मैं छुट्टी लेकर बैठ गया.
इसी बीच हम दोनों के सूरतगढ़ ट्रान्सफर के ऑर्डर आ गए जहां आकाशवाणी का नया स्टेशन खुला था. मुझे महसूस हो गया, बीकानेर में अपना दाना पानी ख़त्म. जिस शेखों के मोहल्ले में आँखें खोली थीं, जिस ताजिये की चौकी के पास रतन, सत्तू, पुष्कर, रहीमा, हुसैन, ब्रजराज सिंह, श्याम सुन्दर के साथ मिलकर मारदड़ी और सत्तोलिया खेला था, उन सबसे मेरा रिश्ता हमेशा के लिए ख़त्म होने जा रहा था. अप्रैल में हम लोग बीकानेर छोड़कर सूरतगढ़ की ओर चल पड़े. जाते ही एक बार डाक बंगले में डेरा डाला. बीकानेर भी हालांकि कोई बडा शहर नहीं है मगर फिर भी सूरतगढ़ आकर लगा कि अलबत्ता बीकानेर एक शहर तो है. अब तो मानो एक गाँव में आ गए थे.
नहा धोकर एक साइकिल रिक्शा लेकर हम  लोग आकाशवाणी सूरतगढ़ पहुंचे जो गंगानगर रोड़ पर है. कस्बे से काफी दूर. आस पास खाली मैदान, सामने की ओर एक बडा सा रेत के टीलों का समूह, जिसे हनुमान धोरा के नाम से लोग जानते थे. वहीं एक कॉलेज बना हुआ था. आस पास और कुछ भी नहीं. हम लोग अन्दर घुसे . डायरेक्टर साहब के कमरे में पहुंचे तो वहाँ कोई नहीं था. हम लोग बैठ कर उनका इंतज़ार करने लगे. कोई 7-8 मिनट बाद एक भारी से शरीर के साहब अन्दर आये और हमारी तरफ सवालिया निगाहों से देखा. मैंने अपना परिचय दिया तो हर लफ्ज़ के साथ उनका चेहरा संजीदा होता चला गया. मेरी बात जैसे ही ख़तम हुई उन्होंने कहा, “अभी हमारी मीटिंग होने वाली है, आप लोग थोड़ी देर पास के कमरे में बैठिये. मैं आपसे थोड़ी देर बाद बात करूंगा.”
हम लोग वहाँ से उठकर आये और पास के कमरे में बैठ गए. थोड़ी देर बाद चपरासी ने आकर कहा कि साहब बुला रहे हैं. हम दोनों उनके कमरे में गए और उनके सामने रखी कुर्सियों पर बैठ गए.
कुछ देर खामोश रहने के बाद वो ऐसी संजीदगी के साथ सोगवार आवाज़ में बोले मानो किसी की मौत की खबर दे रहे हों, “देखिये मिस्टर मोदी........ साफ़ बात ये है कि मैं आप लोगों को अपने स्टेशन पर लेना नहीं चाहता. मैंने अभी अभी दिल्ली बात की है और उनसे कहा है कि मैंने इस जंगल में आकर एक नया स्टेशन खोला है, अगर आप मुझे कोई सुविधा नहीं दे सकते तो मेहरबानी करके मेरे पास असुविधाएं  मत भेजिए. आप अभी ज्वाइनिंग रिपोर्ट मत दीजिये. शायद आपको कहीं और भेज दिया जाए.”
वो सीधे सीधे हमें असुविधाएं बोल रहे थे. बहोत बुरा लग रहा था, मगर वक़्त खराब चल रहा था. मैं क्या बोलूँ, क्या न बोलूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा था. मैं जानता था कि वो हमारी ज्वाइनिंग रिपोर्ट लेने से मना नहीं कर सकते क्योंकि ये डायरेक्टरेट का हुक्मनामा था और हमें ज्वाइन न करवाने का मतलब होगा हुक्मउदूली, जो कि सरकारी नौकरी में बहोत बडा जुर्म है. मैंने उनसे नम्र आवाज़ में कहा, “सर आप स्टेशन के मालिक हैं, जो चाहे कर सकते हैं. हम तो अपनी ज्वाइनिंग रिपोर्ट दे रहे हैं, अब आगे जैसा आप चाहें करें. आप चाहें तो हमें ज्वाइन करवाएं चाहे तो न करवाएं. जहां तक सुविधा असुविधा की बात है, तो ये तो आप हमें ज्वाइन करवा लेंगे, हम यहाँ काम करेंगे, तभी समझ पायेंगे कि हम लोग सुविधा हैं या असुविधा.”
उन्होंने अपने माथे का पसीना पोंछा क्योंकि वो इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि अगर हम ज्वाइनिंग रिपोर्ट उन्हें दे देते हैं तो उन्हें हमें ज्वाइन करवाना ही पड़ेगा. इसके अलावा कोई चारा नहीं है. कुछ देर सोचने के बाद उसी संजीदा आवाज़ में बोले, “ठीक है, मैं आपको ज्वाइन करवा लूंगा, मगर मेरी कुछ शर्तें हैं.”
मैं जानता था, अब ये चाहे कुछ भी कहें, हम पर कोई भी शर्तें लादें, इन्हें ज्वाइन तो करवाना ही पडेगा. मैंने कहा. “जी सर ....”
“आप कोई लड़ाई झगड़ा नहीं करेंगे.”
“जी सर “
“कोई  रूल्स कोट नहीं करेंगे “
“जी सर.”
“ हर मामले में मेरा जो भी फैसला होगा, सही या ग़लत, उसे स्वीकार करेंगे.”
“जी सर........ लेकिन........”
इस पर वो चिल्ला पड़े, “नो लेकिन......... मैं जो कह रहा हूँ उसे एक्सेप्ट कीजिये, वरना यहाँ ज्वाइन नहीं कर सकते आप.”
मैं जानता था, उनकी ये बात सही नहीं है और ये भी जानता था कि वो हमें ज्वाइन करने से नहीं रोक सकते, फिर भी मैंने उनकी बात को थोड़ा तरमीम के साथ कुबूल किया और कहा, “जी सर , आपकी हर सही और जायज़ बात को हम मानेंगे.”
उन्होंने शायद एक कड़वा सा घूँट पीकर मेरी बात को स्वीकार कर लिया. प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव अचल साहब को बुलाया और कहा, “इन्हें ज्वाइन करवा दीजिये.”
अचल साहब हमें अपने कमरे में ले गए. अकाउंटेंट को बुलवाया और हमें ज्वाइन करवाने को कहा. इस तरह हमने आकाशवाणी, सूरतगढ़ पर ज्वाइन कर लिया. ड्यूटीरूम में हम चार लोग थे. कुलविंदर सिंह कंग, गुप्ता और हम दोनों. आकाशवाणी, सूरतगढ़ इतनी जल्दबाजी में शुरू किया गया था कि कोई अनाउंसर वहाँ रिक्रूट नहीं किया गया था. राजस्थान के जितने भी स्टेशंस थे, उनके अनाउंसर  15-15 दिन के टूर पर आते थे और हम चार लोग ड्यूटीरूम में काम कर रहे थे.
मेरा एक स्कूल का दोस्त महेश शर्मा सूरतगढ़ के सरकारी अस्पताल में डॉक्टर था. उसने अपने घर के पास सिडाना जी के घर में दो कमरों का एक सैट किराए पर दिलवा दिया.
डायरेक्टर साहब से जब भी मुलाक़ात होती थी, उनका मुंह हम से फूला फूला सा रहता था. कभी भी सीधे मुंह बात नहीं करते थे. हम लोग भी उनके इस बर्ताव को सहन कर रहे थे. इसी बीच आकाशवाणी, जयपुर के कुछ अनाउंसर  टूर पर आये और तरह तरह के नखरे करने लगे. उन्हें लगता था कि हमें सूरतगढ़ पनिशमेंट ट्रान्सफर पर भेजा गया है, इसलिए हमारे खिलाफ जो भी कहा जाएगा, किया जाएगा, गलती हमारी ही मानी जायेगी. एक दिन एक अनाउंसर की सुबह की मेरे साथ ड्यूटी थी. मैंने पूरा ट्रांसमिशन का सामान चेक कर के ड्यूटी रूम की मेज़ पर रख दिया. एनाउंसर साहब आये और बोले, “मोदी जी, मटेरियल चेक कर लिया आपने?”
मैंने कहा, “जी चेक कर लिया. सब ठीक है. ले जाइए इसे अन्दर.”
वो हंसकर बोले, “मुझे सारा मटेरियल अन्दर स्टूडियो में चाहिए.”
“देखिये , इस वक़्त इतनी सुबह कोई क्लास फोर यहाँ मौजूद नहीं है, लिहाजा मटेरियल आपको ही अन्दर लेकर जाना होगा.”
हंसी उनके चेहरे से गायब हो गयी और वो थोड़ा आवाज़ को ऊंची करते हुए बोले “मैंने भी कहा ना आपको कि सारा मटेरियल मुझे स्टूडियो में चाहिए.”
“जी ये मटेरियल रखा है, सुबह सुबह नाटक मत कीजिये. शुरू के दो तीन टेप ले जाइए, अभी स्टूडियो गार्ड साहू आयेगा तो बाकी का सामान मैं अन्दर भिजवा दूंगा.”
“जी नहीं मैं स्टूडियो में तभी जाऊंगा जब आप ये मटेरियल स्टूडियो में पहुंचा देंगे. वरना अपने राम तो यहाँ सोफे पर लेटे हुए हैं.”
अब मैं अपने गुस्से पर काबू नहीं कर सका. मैंने कहा, “आपको सोफे पर लेटने का शौक़ है तो लेटे रहिये. “
वो इंसान बहोत जिद्दी था और सोचता था कि चाहे कुछ भी हो जाए गलती तो हमारी ही मानी जायेगी. मैंने देखा, ट्रांसमिशन शुरू होने का वक़्त हो रहा था और वो इंसान सोफे पर पसरा हुआ था. मेरे लिए ट्रांसमिशन करना कोई नई चीज़ नहीं थी क्योंकि मैं कैज़ुअल अनाउंसर भी रह चुका था और 6 महीने तक जोधपुर में परमानेंट अनाउंसर भी. मैंने दो टेप उठाये और स्टूडियो में जाकर उन्हें लगाया और ट्रांसमिशन शुरू कर दिया. जैसे ही ट्रांसमिशन शुरू हुआ, वो अनाउंसर महोदय स्टूडियो में आये और बोले, “अरे छोडिये, चलिए...... मैं करता हूँ आगे का ट्रांसमिशन. आप भी क्या याद रखेंगे ? आपको कोई माफ़ करने वाला इंसान भी मिला था.”
उनके ये अल्फ़ाज़ मेरे सीने में तीर की तरह चुभे. मैं सब कुछ भूल गया..........वो मेरे खिलाफ चलने वाला केस..............वो डायरेक्टर साहब की शर्तें और मेरे खराब हालात. मैंने कहा, “जाइए आप स्टूडियो से बाहर जाइए. आपकी ज़रूरत नहीं है.”
वो भी गुस्से में भरकर बोले, “ज़रूरत कैसे नहीं है ? मेरी ड्यूटी है.”
ऐसा कहकर वो छीना झपटी करने लगे. अब मैं अपने आप पर काबू नहीं कर पाया, मैंने उनके एक ज़ोरदार लात जमाई और उन्हें स्टूडियो से धक्का देकर बाहर निकाला और ट्रांसमिशन खुद ही करने लगा. वो चिल्लाते हुए बाहर भागे. मैंने सुबह का पूरा ट्रांसमिशन किया. मीटिंग के वक़्त से पहले मैंने डायरेक्टर साहब को सारा वाकया फ़ोन पर बताया. वो तो पहले से ही मेरे खिलाफ कुछ ग्रंथियां पाले बैठे थे. वो बोले, “मिस्टर मोदी, आपने फिर अपनी दादागिरी शुरू कर दी ना?”
“सर आप पूरे हालात पर गौर कीजिये और देखिये कि क्या मैं कहीं ग़लत हूँ ?”
“देखिये मिस्टर मोदी, आप मुझसे किया हुआ वादा तोड़ रहे हैं. आपने वादा किया था कि आप किसी से लड़ाई झगड़ा नहीं करेंगे.”
“ जी सर, लेकिन आप ही बताइये कि क्या कोई अनाउंसर मुझे इस बात के लिए मजबूर कर सकता है कि सारा ट्रांसमिशन मटेरियल मैं उठा कर स्टूडियो में पहुंचाउंगा और वो सिर्फ अनाउंसमेंट करेगा ?”  
उन्होंने फ़ोन काट दिया. मैं अपनी जगह बिलकुल सही था इसलिए मुझे किसी का कोई डर नहीं था. मीटिंग में मैंने रिपोर्ट लिखी कि अनाउंसर ने किस तरह का व्यवहार किया और किन हालात में मुझे ही पूरा ट्रांसमिशन करना पडा. नतीजतन डायरेक्टर साहब ने उन अनाउंसर महोदय को वापस जयपुर  भिजवाने के ऑर्डर्स कर दिए लेकिन मुझसे वो वैसे ही मुंह फुलाए रहे. इसी बीच एक और घटना हो गयी. हर इंसान सोचता था कि चाहे वो मेरे साथ कैसा भी बर्ताव करें, गलती मेरी ही मानी जायेगी, चाहे मेरी गलती हो चाहे ना हो क्योंकि मुझे पनिशमेंट पर यहाँ भेजा गया था .
एक प्रोग्राम दिन में 1.50 पर होता था, कृषिलोक, जिसका कुछ हिस्सा जयपुर से रिले किया जाता था और बाज़ार भाव और मौसम जैसी चीज़ें लोकल लेवल पर जोड़ी जाती थी. कुल मिलाकर ये एक उलझा हुआ सा प्रोग्राम था, जिसमे कई बार जयपुर रिले लेना पड़ता था और कई बार स्टूडियो से लाइव करना होता था. जयपुर के ही एकअनाउंसर ड्यूटी पर थे. कृषिलोक से थोड़ा सा पहले मुझे स्टूडियो में बुलाया. मैं जैसे ही अन्दर पहुंचा, पेट पर हाथ रखकर कराहते हुए बोले, “मेरे पेट में बहोत दर्द हो रहा है. मैं आगे अनाउंसमेंट नहीं कर सकता.” बस 1:50 होने ही वाले थे. कुछ भी सोचने का वक़्त नहीं था. अनाउंसर साहब पेट पकड़े हुए फर्श पर पड़े थे. मैंने फ़ौरन अनाउंसर की कुर्सी संभाली और प्रोग्राम की ओपनिंग करके जयपुर रिले ले लिया. अब मैं अनाउंसर की तरफ मुड़ा. मैंने बिलकुल शान्ति के साथ उनसे कहा, “चलिए तीन चार मिनट का वक़्त है, इस बीच मैं आपको किसी के साथ हॉस्पिटल भिजवा देता हूँ.”
 वो बोले, “नहीं रहने दीजिये, थोड़ी देर में ठीक हो जाऊंगा.”
मैंने कहा, “ठीक है, जैसी आपकी मर्ज़ी.”
जयपुर से वार्ता ख़त्म हुई तो मैंने बाज़ार भाव पढने के लिए रिले काटकर माइक्रोफोन खोला और बाज़ार भाव पढ़ दिए, लोकल मौसम का हाल भी पढ़ा और प्रोग्राम की क्लोजिंग सिग्नेचर ट्यून के लिए वापस जयपुर रिले दे दिया. सिग्नेचर ट्यून ख़त्म हुई. रिले काटकर मैंने 2 बजे के प्रोग्राम का अनाउंसमेंट किया और टेप चला दिया. अब अनाउंसर महोदय ठीक हो गए थे. उठकर बोले, “हटिये, अब मैं ठीक हूँ. आगे के अनाउंसमेंट मैं कर लूंगा.”
मैंने कहा, “ठीक है, आइये कीजिये.”
अब उन्होंने वापस अपनी कुर्सी संभाल ली. मुझे याद आया, इन साहब ने दो तीन रोज़ पहले ड्यूटीरूम में बैठे बातें करते हुए मुझसे कहा था, “अनाउंसर्स से कभी पंगा मत लिया कीजिये. वो आपको कभी भी फंसा कर छोड़ सकते हैं.”
मैंने जवाब में मुस्कुराते हुए जवाब दिया था, “ये आप उन लोगों से कहिये, जो स्टूडियो हैंडल ना कर सकते हों.”
मैं समझ गया था कि आज जो एपिसोड हुआ है, वो मुझे सबक़ सिखाने के लिए ही प्लान किया गया था. उन्होंने सोचा कि कृषिलोक इतना उलझा हुआ प्रोग्राम है, अगर वो पेट दर्द का नाटक करेंगे तो मेरे हाथ पाँव फूल जायेंगे और मैं उनकी मिन्नतें करने लगूंगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और मैंने बहोत आसानी से स्टूडियो संभाल लिया. उनका सबक़ सिखाने का अरमान दिल में ही रह गया. मैंने इस वाकये की रिपोर्ट लिखी जिसे अगले दिन प्रोग्राम मीटिंग में पढ़ा गया. मीटिंग में इस बात पर ज़्यादा चर्चा नहीं हुई लेकिन  अचल साहब को अंदाज़ा लग गया कि वास्तव में क्या हुआ था. अंदाज़ा शायद डायरेक्टर साहब को भी हो गया था लेकिन उनका गुस्सा मुझपर से कम नहीं हुआ था. मीटिंग के बाद अचल साहब मेरे कंधे पर हाथ रखे रखे मुझे अपने कमरे में ले गए और बोले, “काका गल की हुई सी, मैनूं साफ़ साफ़ दस.”
मैंने उन्हें दो तीन दिन पहले की वो घटना सुना दी जब उन अनाउंसर महोदय ने मुझे अनाउंसर्स से पंगा न लेने का मशविरा दिया था. मैंने कहा कि उसी चैलेन्ज की अगली कड़ी थी ये घटना. अचल साहब बोले, “ये बाहर से आने वाले अनाउंसर्स वाकई बहोत परेशान कर रहे हैं लेकिन जब तक हम कैज़ुअल अनाउंसर्स का पैनल ना बना लें हमें इनको झेलना ही पडेगा.”
मैंने कहा, “सर ऐसा कुछ नहीं है कि झेलना ही पडेगा.  गुप्ता जी को छोड़कर शायद हम तीनों लोग  ड्यूटीरूम के साथ ही साथ स्टूडियो भी संभाल सकते हैं. आप चाहें तो कुलविंदर से पूछ लीजिये और फिर हमारी एक मीटिंग डायरेक्टर साहब के साथ करवा दीजिये.”
अचल साहब ने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा, “करना हाँ मैं गल डायरेक्टर साब नाळ.”
दरअसल मैं, मेरी पत्नी और कुलविंदर हम इस मसले पर पहले ही आपस में बातचीत कर चुके थे कि बाहर से टूर पर आने वाले अनाउंसर्स के टूर बंद करवाकर स्टूडियो अपने हाथ में ले लिया जाए क्योंकि यशपाल जी, अरविन्द माथुर, सुबोध निगम, भगवान् मिहरचंदानी जैसे कुछ लोगों को छोड़कर बाकी लोग बहोत परेशान कर रहे थे. गुप्ता जी को इस चर्चा में शामिल करने का कोई अर्थ नहीं था क्योंकि वो रेडियो में आ ज़रूर गए थे लेकिन वो रेडियो के लिए नहीं बने थे. वो स्टूडियो के नाम से ही घबरा जाते थे. नया नया स्टेशन था. लायब्रेरी भी बनाई जा रही थी. एक दिन डायरेक्टर साहब ने गुप्ता जी को कहा, “गुप्ता, तुम कुछ और नहीं कर सकते तो लायब्रेरी को संभालो. ये जो सारे रिकार्ड्स आ रहे हैं, इन्हें अल्फाबेटिकल ऑर्डर में लगा दो.”
गुप्ता जी ज़रा हिचकिचाते हुए बोले, “जी...... सर........ कर तो दूंगा लेकिन........ मेरे साथ एक किसी और को भी लगा दीजिये.”
“क्यों एक और को लेकर क्या करोगे ?”
“जी दरअसल मेरे.............अल्फाबैट्स थोड़े कमज़ोर हैं”  
डायरेक्टर साहब ने अपने सर पर हाथ मारा और बोले, “छोडो.... तुमसे कुछ नहीं होगा.”
यही गुप्ता जी कुछ वक़्त बाद यू पी के पी सी एस में सलैक्ट हो गए. गुप्ता जी का रेडियो से पीछा छूटा और रेडियो का गुप्ता जी से.
अगले ही दिन हम दोनों को और कुलविंदर को डायरेक्टर साहब के कमरे से बुलावा आया तो हम समझ गए कि अचल साहब ने हम लोगों की बात को वहाँ तक पहुंचा दी है.
हमें बैठने का हुकुम हुआ. डायरेक्टर साहब ने हम लोगों के प्रस्ताव पर अपनी रजामंदी तो जताई मगर साथ ही हमसे वादा करने को कहा कि हम कोई नई दिक्क़त खडी नहीं करेंगे. मैंने नोटिस किया कि वो हम तीनों से बात तो कर रहे थे, लेकिन मेरे सामने बिलकुल नहीं देख रहे थे. थोड़ी देर हम उनकी बातें सुनते रहे. मीटिंग इस फैसले के साथ ख़त्म हुई कि अब बाहर के अनाउंसर लोगों को टूर पर नहीं बुलाया जाएगा.
अब पूरा ट्रांसमिशन मुझे, मेरी पत्नी को और कुलविंदर को संभालना था.    

           



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